क़ुर्बत-ओ-फ़ासला
कुछ रिश्तों की शुरुआत याद नहीं रहती।
बस एक दिन एहसास होता है
— कोई हमारी ज़िंदगी में चुपचाप अपनी जगह बना चुका है।
तुम भी ऐसे ही आए थे।
न कोई वादा, न कोई बड़ी बात।
बस कुछ अधूरी मुलाक़ातें, कुछ बातें और तुम्हारी आवाज़।
अब कभी किसी अनजान चेहरे पर तुम जैसी मुस्कान दिखती है,
तो एक पल को ठहर जाता हूँ।
फिर ख़ुद ही मुस्कुरा देता हूँ — तुम तो वहाँ होते ही नहीं।
फिर भी जाने क्यों, बारिश की मिट्टी, कोई पुराना गाना, सड़क पर जलती पीली रोशनी, या किताब की कोई पंक्ति
— इन सबमें तुम अब भी मिल जाते हो।
जबकि तुम नहीं हो।
मैंने तुम्हें रोकने की कोशिश नहीं की।
तुमने भी लौटकर नहीं देखा।
शायद हमें लगा था जो था, वो बिना कहे भी समझा गया होगा।
मगर कुछ बातें समझ आने के बाद भी अधूरी रह जाती हैं।
हमारे बीच भी कुछ ऐसा ही था
— न पूरा प्यार, न पूरी दूरी।
बस एक रिश्ता, जिसे कोई नाम नहीं मिला,
लेकिन जो ख़त्म भी नहीं हुआ।
कभी सोचता हूँ, उस दिन थोड़ा और रुक जाता,
एक बात और कह देता, तो शायद कहानी कुछ और होती।
फिर लगता है
— हर कहानी का पूरा होना ज़रूरी तो नहीं।
तुमसे बात करने का मन आज भी कभी-कभी करता है।
बहुत कुछ कहना है।
फिर डर लगता है
— कहीं कह देने से वो सब छोटा न पड़ जाए जो ख़ामोशी में इतना बड़ा था।
इसलिए कुछ नहीं कहता।
बस जब रात बहुत ख़ामोश होती है और तुम्हारी याद बिना बताए चली आती है, उसे थोड़ी देर बैठने देता हूँ।
बिल्कुल वैसे ही जैसे कभी तुम बैठे थे मेरे पास
— बिना कुछ कहे।
शायद यही हमारे बीच अब भी बचा है।
तुम वहाँ हो, मैं यहाँ।
और फिर भी,
दिल के किसी अनकहे कोने में हम दोनों अब भी थोड़े-से साथ हैं।
